आज हम मेक इन इंडिया उस दिन की बात करेंगे जो
एयरोडायनेमिक होंगी लेकिन इनको कोई भारतीय कंपनी नहीं बनाएगी।
दरअसल हम बात कर रहे हैं दिल्ली- मेरठ आरआरटीएस
लाइन पर चलने वाली रोलिंग स्टॉक्स की जिनको मैन्युफैक्चरिंग करने का टेंडर बाहर की
एक कंपनी को मिल सकता है। और यह ऐसा उस कंपनी द्वारा कम कीमतों पर लगाई गई बोली हो
सकती है।
दिल्ली और मेरठ के बीच रैपिड रेल ट्रांसीट
सिस्टम के काम को शुरू किया जा चुका है। और इसके अंतर्गत दिल्ली और मेरठ के बीच एक
ऐसा रेल कॉरिडोर बनाया जा रहा है जिस पर ट्रेन 160 किलोमीटर प्रति
घंटे की रफ्तार से दौड़ेगी। इस प्रोजेक्ट के पूरा हो जाने के बाद दिल्ली से मेरठ
के बीच 82
किलोमीटर की
दूरी महज 55 मिनट में तय की जा सकेगी।
अगस्त 2019 में इस रूट पर चलने वाली ट्रेनों के लिए
टेंडर निकाला गया था। और इस टेंडर में बाहर की कुछ कंपनी और साथ में भारत की दो
कंपनियों ने भाग लिया था। भाग लेने वाली पहली विदेशी कंपनी Alstom,
बंबाडियर,
CAF India जैसी कंपनी के अलावा बीसीएमएल और टीटागढ़ फिरेमा जैसी भारतीय कंपनी ने इस
टेंडर में भाग लिया था।
और इस टेंडर में 2
शर्ते रखी गई थी
पहली शर्त यह थी कि सभी ट्रेन है मेक इन इंडिया प्रोग्राम के तहत इंडिया में ही
बनेगी। और दूसरी शर्त यह भी थी कि ट्रेनों की अधिकतम रफ्तार 160
किलोमीटर प्रति
घंटा होगी।
वहीं दूसरी शर्त के चलते भारत की दोनों कंपनियों को इस टेंडर से बाहर
होना पड़ा था। क्योंकि इन दोनों कंपनियों में से किसी को भी 160
किलोमीटर प्रति
घंटे से चलने वाली ट्रेनों को बनाने का पिछला कोई अनुभव नहीं था। और इन दोनों
भारतीय कंपनियों ने यह आरोप लगाया है कि इस टेंडर में बाहर की कंपनियों को ज्यादा
महत्व दिया गया है और इस शिकायत की जांच अभी चल रही है। कल ही यह खबर निकल कर आई
है कि इन ट्रेनों के कॉन्ट्रैक्ट को बंबाडियर को दिया जा सकता है। क्योंकि बंबा
डीएनए ने ही इस ट्रेन को फैक्चर करने का सबसे कम कीमतें आगे रखी है।
लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस मिल जाने के बाद बंबा
डियर को 210
standard ब्रॉड गेज 243 हफ्तों में पूरा करके देना होगा। और साथ ही 15
साल का
मेंटेनेंस सर्विस बॉन्ड भी साइन करना होगा। सभी ट्रेनों को भारत में ही मैन्युफैक्चर
किया जाएगा और यह सभी ट्रेनें एयरोडायनेमिक होंगी साथ ही साथ इसके अलावा स्टैंडर्ड
के से चलने वाली कोशिश 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रास्ता पर चल सकेगी
हालांकि इनको 160 किलोमीटर उपर नहीं चलाया जाएगा। हर रेन सेट
में 9 कोचे होंगी । और साथ
ही साथ इनमें यूरोपीयन कंट्रीज जैसे सिगनलिंग सिस्टम का इस्तेमाल भी होगा। हमको इस
बात की कोई बुराई नहीं रखती की बाहर की कंपनियां भारत में मेड इन इंडिया के तहत
ट्रेनों को मैन्युफैक्चर करें। इससे रोजगार तो बढ़ता ही है और साथ ही साथ नई
टेक्नोलॉजी भारत में आती है आपको क्या लगता है कि क्या भारतीय कंपनीज को भी केवल
ऐसे टेंडर देना चाहिए या फिर बाहर की कंपनी को भी भारत में मैन फैक्चर करने का
मौका देना चाहिए। अपने विचार हमें कमेंट करके बताइए।
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